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रोजाना एक कविता : आज पढें प्रमोद पवैया की कविता तथागत

A poem a day: Read Pramod Pawaiya's poem Tathagat today

राजमहल को वह छोड़े जो
राजमहल से ऊब चुका हो
किंतु हमारा कच्चा घर इस घटना के अनुकूल नहीं है!

राजभोग वह छोड़े जिसकी
थाली में हठ कर आया हो
वह क्या छोड़े जिसे भाग्य ने
चौखट-चौखट भटकाया हो

महक चुभे उसको जो हर विधि
नीलकमल से ऊब चुका हो
किंतु हमारे मन – उपवन में ऐसा कोई फूल नहीं है!

जिसने सब कुछ बोल लिया हो
वह अब जाकर मौन साध ले
जो पूरा बह चुका खुशी से
अपने ऊपर बाँध बाँध ले

ध्यान रमे वह जो जीवन की
उथल-पुथल से ऊब चुका हो
किंतु ध्यान में बहे हमारा दुःख इतना निर्मूल नहीं है!

हमें श्वास के पथ पर चलती
बाधा दौड़ सही लगती है
और हमारी यशोधरा भी
हर दिन नई-नई लगती है

हो जाए वह हृदय तथागत
जो काजल से ऊब चुका हो
किंतु हमें कजरी आँखों में दिखती कोई भूल नहीं है!!

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