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रोजाना एक कविता : आज पढ़ें पंकज मिसरा की कविता मेरे समुद्र!!

प्यार से उपजी घृणा का स्वाद कितना मधुर है
मेरे समुद्र! मेरे प्यार!

एक लंबी राह चलकर आया तुम्हारे पास
कितनी नदियों को पार किया
पर्वत लांघे, रेत पर चले, जंगलों में खोए
ये देखो, चलते-चलते छालों से भर गए पाँव
मुझे तुम तक पहुँचना ही था, डूबना था, थाह लेनी थी

पहुँचा भी लेकिन तुम्हारी लहरों ने उछाल दिया
बार-बार तुम्हे छूने की कोशिशें बेकार गईं
अब मैं किनारे पर बैठकर मछलियों से बातें करता हूँ
मेरे पास तुमसे कहने को कुछ नहीं है
क्या संदेशा भेजूँ सिवा इसके कि तुम्हारे पास आना चाहता हूँ
एक छोटी-सी मछली की तरह

मेरे समुद्र! मेरे प्यार!
कितनी पूरनमासियाँ बीत रही हैं
मैं रेत में ठहरा हुआ हूँ सदियों से
पूरनमासी की किसी रात चाँद का आकर्षण तुम्हे लाएगा मेरे करीब
मैं तुम्हारे ज्वार में समा जाऊँगा
मैं कहीं नहीं जाऊँगा

हो सकता है फिर कोई लहर उछाल दे किनारे पर
शंख-सीपियों की तरह तरह दबा रहूँ रेत में
किसी रोज कोई बच्चा बीनकर ले जाए मुझे नर्म हाथों से
फिर भी मैं उसके हाथों में तुम्हारी याद बनकर रहूँगा

बरसों बाद प्रेम में खोई कोई लड़की तुम्हारे पास आए
उसके गले में सीपियों का हार देखना
याद करना उस बच्चे को जो कभी बीनकर ले गया था शंख-सीपियाँ
तुम्हे मैं याद जरूर आ जाऊँगा
तुम्ही से बना हूँ मैं, तुम्ही में रहूँगा.

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