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रोजाना एक कविता : आज पढ़े कुमार विकल की कविता पहचान

रोजाना एक कविता : आज पढ़े कुमार विकल की कविता पहचान

हमारे दौर में

ये जो सड़क पर खून बह रहा है
इसे सूँघकर तो देखो
सूँघकर तो देखो और पहचानने की कोशिश करो
कि ये हिन्दू का है या मुसलमान का ?

सड़क पर बिखरे हुए पत्थरों के बीच में दबे
टिफिन कैरियर से जो रोटी की गंध आ रही है
वो किस जाति की है
क्या तुम मुझे ये सब बता सकते हो ?
इन रक्त सने कपड़ों, फटे जूतों, टूटी साइकिलों,
किताबों और खिलौनों की है कौम क्या ?
क्या तुम मुझे ये सब बता सकते हो ?

हाँ मैं बता सकता हूँ
ये रक्त सने कपडे उस आदमी के हैं
जिसके हाथ मिलों में कपड़ा बुनते हैं
कारखानों में जूते बनाते हैं
खेतों में बीज डालते हैं पुस्तकें लिखते हैं,
खिलौने बनाते हैं और
शहर की अंधेरी सडकों के लैम्पपोस्ट जलाते हैं।

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