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रोजाना एक कविता : आज पढ़े प्रवीण फ़कीर की ग़ज़ल मैं कैसे

तेरे हाथों में था खंज़र ……ये गवाही उसकी,
अपने हाथों से ही फिर क़त्ल हुआ मैं कैसे।

सारी दुनिया है तिरे नाम से रोशन फिर भी,
तुझसे मिल कर भी अधूरा ही रहा मैं कैसे।

बेख़ुदी हावी रही मुझ पे …हमेशा की तरह,
ख़ुद की बातों से ख़बरदार… हुआ मैं कैसे।

तुझ को मिल जाते ज़माने में हज़ारों मुझसे,
तिरे किस्से का ही किरदार …हुआ मैं कैसे।

तेरी आँखों से तिरे दिल में उतारना था मुझे,
तेरी गलियों का मुसाफ़िर ही ..रहा मैं कैसे।

तेरी दुनिया में चला आया मुसाफ़िर बन कर,
अपनी माटी से हुआ दूर ……. बता मैं कैसे।

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