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motivational story : शक्ति की सीमा

श्रीकृष्ण ने जब शिशुपाल का वध किया तो अर्जुन ने आश्चर्य से पूछा, ‘जैसे आज निमिष मात्र ही में आपने इस दुष्ट को मृत्युदंड का पात्र मान लिया, वैसे आप पहले भी इसे मार सकते थे। यह तो सदैव आपका अपमान करता आया था।”

श्रीकृष्ण ने आत्मस्थ गाम्भीर्य के साथ उत्तर दिया, ‘धनंजय, मैं तुम्हारा प्रश्न समझता हूं, आज की तरह कभी भी मैं उसका संहार कर सकता था, किन्तु मेरे सम्मुख सदैव एक प्रश्न रहा है कि क्या बल का धर्म सदैव दंड देना ही है, क्षमा या सहन करना नहीं है? क्षमा तो बलवान ही कर सकता है, दुर्बल क्या क्षमा करेगा? सहन भी वही करेगा, जिसके पास सहनशक्ति होगी।

अशक्त क्या सहन करेगा? अब तक मैं अपनी इन्हीं शक्तियों की परीक्षा कर रहा था। अपनी ही थाह ले रहा था कि मुझमें जो शक्ति है, वह कितनी मेरी है, क्योंकि शक्ति उतनी ही हमारी होती है, जिस पर हमारा, हमारे संकल्प का अंकुश रह सकता है।’

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