
मुंबई : (Mumbai) निर्देशक और एक्टर अनुराग कश्यप (Director and actor Anurag Kashyap)अपनी ज़्यादातर फिल्मों लेकर हमेशा ही चर्चा में रहते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही लेकर आए हैं, जिस पर चर्चा होना तय है। 5 जून को सिनेमाघरों में फिल्म ‘बंदर’ रिलीज (film ‘Bandar’ was released in theaters on June 5th) हो चुकी है। ये फिल्म कानून-व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करती है। कोई व्यक्ति कैसे केस इंसान मकड़जाल की तरह फंस जाता है। यह आज के मुद्दों को उठाते हुए चलती है। फिल्म देखते वक्त आपको लगेगा कि हम कोई आज का अखबार पढ़ रहे हैं, जिसमें ऐसी घटनाएं अक्सर छपती रहती हैं, लेकिन उन्हें अखबार के अंदर के पन्नों पर जगह मिलती है।
क्या कहती है कहानी…
कहानी शुरू होती है एक गुंडे की पिटाई से, जिसको पुलिस पकड़ती रहती है। फिर आते हैं समर मेहरा यानी बॉबी देओल। कभी वह फिल्म इंडस्ट्री में बड़ा सितारा था, लेकिन अब उसकी चमक फीकी पड़ चुकी है। एक शादी में लोग उसके साथ तस्वीर लेने के बजाय खुद की सेल्फी लेने में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं। यही सीन समर के गिरते स्टारडम का सबसे सटीक परिचय बनता है। इसी बीच गायत्री नाम की महिला उस पर रेप का गंभीर आरोप लगा देती है और उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। पुलिस हिरासत, अदालत, मीडिया ट्रायल और जेल के भीतर होने वाली अनेक घटनाओं के बीच समर खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश करता रहता है।
समस्या यह है कि फिल्म का विषय जितना पेंचीदा है, उसका प्रस्तुतिकरण उतना ही सीधा और सुविधाजनक लगता है। कहानी में बार-बार लगता कि समर के साथ कितना गलत हो रहा है, लेकिन दूसरे पक्ष को समझाने में फिल्म थोड़ी नाकाम नज़र आती है। इसी वजह से फिल्म अंत तक आते-आते कमज़ोर लगने लगती है।
फिल्म में एक्टिंग
बॉबी देओल (Bobby Deol) मुख्य भूमिका में हैं और उन्होंने अपने किरदार बखूबी निभाया है। हाल में खलनायक वाली छवि के बाद यहां वह पूरी तरह अलग रूप में नजर आए हैं। कई सीन में बॉबी बिना ज्यादा डायलॉग के भी असर छोड़ जाते हैं। यह उनके हालिया सर्वश्रेष्ठ अभिनयों में से एक कहा जा सकता है। सान्या मल्होत्रा (Sanya Malhotra) ने बॉबी की बहन का अच्छा रोल अदा किया है। उनका स्क्रीन प्रेजेंस कम है, लेकिन जितना है वह फिल्म के भीतर असर छोड़ता है। इंद्रजीत सुकुमारन (Indrajith Sukumaran) सीमित समय में भी प्रभाव छोड़ते हैं। जेल के भीतर उनका किरदार फिल्म में थोड़ी ऊर्जा लेकर आता है। सपना पब्बी और अन्य कलाकार अपने हिस्से का काम ठीक से करते हैं, लेकिन पटकथा उन्हें ज्यादा गहराई नहीं देती।
फिल्म में निर्देशन और तकनीकी पक्ष
अनुराग कश्यप (Anurag Kashyap) का निर्देशन कई जगह बेहद प्रभावशाली लगता है। जेल के अंदर वाले सीन बेचैन करते हैं और वहां की व्यवस्था की क्रूरता को असहनीय महसूस कराते हैं। कई सीन तो डॉक्यूमेंट्री जैसा एहसास कराते हैं। यहीं फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी भी सामने आती है। निर्देशक सवाल तो बड़े उठाते हैं, मगर उनके जवाब बहुत आसान और एकतरफा लगते हैं। कहानी में संतुलन की कमी साफ दिखाई देती है।
दूसरा हिस्सा जरूरत से ज्यादा लंबा महसूस होता है। थोड़ा और काम किया जाता तो फिल्म ज्यादा असरदार बन सकती थी। कुछ जगह फिल्म दर्शकों को खुद फैसला लेने का मौका देने के बजाय अपना निष्कर्ष थोपती हुई नजर आती है।
फिल्म का म्यूजिक अच्छा है। एक गाना कहानी को पूरी तरह सपोर्ट करता हैं, लेकिन ऐसा कुछ कोई भी गाना नहीं है जो फिल्म खत्म होने के बाद याद रह जाए। बंदर एक दमदार विषय पर बनी फिल्म है, लेकिन दमदार विषय हमेशा दमदार फिल्म नहीं बनाता। बॉबी देओल का शानदार अभिनय, कुछ प्रभावी दृश्य और अनुराग कश्यप का साहसी विषय चुनना इसकी खूबियां हैं। फिल्म आपको बेचैन जरूर करती है, लेकिन उतने प्रभावी तरीके से नहीं।


