
जयपुर (Jaipur) : विप्र फाउंडेशन (Vipra Foundation) ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा लाए गए “ प्रमोशन आफ इक्वेलिटी इन हायर एज्युकेशन इंस्टीट्यूटस रेगुलेशन्स 2026” पर कड़ी आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा है कि यह नियमावली ‘समता’ के नाम पर सामाजिक न्याय की भावना को कमजोर कर सकती है और व्यवहार में चयनित पक्षपात को बढ़ावा देने का माध्यम बन सकती है।
फाउंडेशनके संस्थापक सुशील ओझा (The foundation’s founder, Sushil Ojha) ने सामाजिक कटुता पैदा करने वाले इस गंभीर मुद्दे पर जयपुर सहित राजस्थान भर के प्रमुख पदाधिकारियों से चर्चा की तथा समाजों के बीच खाई बढ़ाने वाले इस मुद्दे पर देशव्यापी आंदोलन छेड़ने की रणनीति को लेकर राष्ट्रीय पदाधिकारियों से विचार विमर्श के लिए मुंबई में आहुत बैठक में भाग लेने के लिए रवाना हो गए।
उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थानों में समरसता (atmosphere of harmony) निष्पक्षता और समान अवसर का वातावरण बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है, किंतु यह प्रस्ताव चुगली-संस्कृति (शिकायत संस्कृति) को प्रोत्साहित करने वाला तथा वर्ग आधारित टकराव को संस्थागत स्वरूप देने वाला प्रतीत होता है। विनियम में प्रयुक्त “विशेषकर/केवल उन्हीं के लिए” जैसी भाषा निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।
ओझा ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था (democratic system) में प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत सर्वोपरि है, परंतु यह ढांचा आरोपित को पहले दोषी मानने जैसी मानसिकता को बढ़ा सकता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि झूठी, दुर्भावनापूर्ण और प्रायोजित शिकायतों पर कठोर दंड एवं स्पष्ट सुरक्षा प्रावधान अनिवार्य रूप से शामिल नहीं किए गए हैं। यह स्थिति शिक्षा-कैंपसों में भय (animosity on educational campuses), असुरक्षा और द्वेष का वातावरण पैदा कर सकती है।
ओझा ने कहा कि समता का अर्थ किसी एक वर्ग को विशेषाधिकार देकर दूसरे वर्ग को संदेह के कटघरे में खड़ा करना नहीं है। समता का अर्थ सभी के लिए न्यायपूर्ण और संतुलित सुरक्षा ढाँचा है। उन्होंने कहा कि इस नियमावली से समाज के समरसता-समर्थक वर्गों में गहरी चिंता है, जो अब आक्रोश में बदल रही है। विप्र फाउंडेशन यूजीसी से मांग करता है कि इस विनियम पर तत्काल पुनर्विचार किया जाए तथा आवश्यक संशोधन कर इसे वास्तव में न्यायपूर्ण, संतुलित, निष्पक्ष और सर्वसमावेशी बनाया जाए।
ओझा ने बताया कि इस विषय में विप्र फाउंडेशन की ओर से प्रधानमंत्री (Prime Minister) को भी पत्र प्रेषित किया गया है। साथ ही देश के सभी सांसदों से आग्रह है कि वे इस विषय को उचित संसदीय-नीतिगत मंच पर मजबूती से उठाएं तथा यह सुनिश्चित करें कि शिक्षण संस्थान जातीय द्वन्द्व व विभाजन से मुक्त रहकर ज्ञान, प्रतिभा और राष्ट्रनिर्माण (nation-building) के केंद्र बने रहें।


