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Balrampur : बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा की तैयारियां जाेराें पर, मूर्ति बाजार में लौटी रौनक

Balrampur: Preparations for Saraswati Puja on Basant Panchami in full swing, idol market buzzing with activity
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बलरामपुर : (Balrampur) ज्ञान, कला और विद्या की आराधना का पर्व बसंत पंचमी (Basant Panchami, the festival of worship of knowledge, art, and learning) जैसे जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे वैसे बलरामपुर जिले में सरस्वती पूजा की तैयारियों ने रफ्तार पकड़ ली है। 23 जनवरी को मनाए जाने वाले इस पर्व को लेकर शहर से लेकर गांव तक उत्साह का माहौल है। पूजा समितियां, छात्र समूह और मोहल्लों के लोग आयोजन को भव्य बनाने में जुटे हैं। इसका सीधा असर मूर्ति निर्माण से जुड़े कारीगरों पर देखने को मिल रहा है, जिनके पास इस बार मांग पहले के मुकाबले कहीं अधिक पहुंच रही है।

बसंत पंचमी को लेकर छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले (Balrampur district of Chhattisgarh) में सरस्वती पूजा की परंपरा हर साल और मजबूत होती जा रही है। खासकर स्कूली बच्चों और युवाओं में इस पर्व को लेकर विशेष आकर्षण देखा जा रहा है। रामानुजगंज सहित जिले के कई इलाकों में छोटे बड़े पूजा पंडाल आकार लेने लगे हैं। कई स्थानों पर बच्चे खुद पंडाल तैयार कर रहे हैं और पूजा की व्यवस्थाओं में जुटे हुए हैं। 23 जनवरी को मां सरस्वती की विधिवत आराधना के लिए तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं।

मूर्ति बाजार में इस बार अलग ही चहल पहल नजर आ रही है। जिले में बाहर से आए मूर्तिकारों और स्थानीय कलाकारों ने बड़ी संख्या में सरस्वती प्रतिमाओं का निर्माण किया है। कारीगरों का कहना है कि इस वर्ष ऑर्डर की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। पिछले साल की तुलना में इस बार लोगों का रुझान अधिक दिख रहा है, जिससे कलाकारों के चेहरे पर भी संतोष झलक रहा है।

मूर्ति निर्माण से जुड़े कलाकारों ने बताया कि इस बार परंपरागत स्वरूप वाली प्रतिमाओं को अधिक पसंद किया जा रहा है। सफेद वस्त्रों में सजी, वीणा धारण किए शांत मुखमंडल वाली सरस्वती प्रतिमाएं लोगों की पहली पसंद बनी हुई हैं। आधुनिक डिजाइन की तुलना में पारंपरिक शैली वाली मूर्तियों की मांग ज्यादा है। पूजा समितियां और परिवार अपनी श्रद्धा और बजट के अनुसार प्रतिमाओं का चयन कर रहे हैं।

बलरामपुर जिला झारखंड की सीमा से लगा हुआ है, जिसका सांस्कृतिक प्रभाव यहां साफ नजर आता है। हर साल बंगाल क्षेत्र से जुड़े कई मूर्तिकार यहां पहुंचते हैं और पूजा के मौसम में प्रतिमाओं का निर्माण कर बिक्री करते हैं। इनमें से कई कलाकार पीढ़ियों से इसी कला से जुड़े हुए हैं। उनके लिए बलरामपुर केवल काम का स्थान नहीं, बल्कि वर्षों से जुड़ा एक परिचित क्षेत्र बन चुका है।

केरवाशीला गांव के युवा कलाकार प्रीतम सरकार बताते हैं कि सरस्वती प्रतिमाओं के निर्माण का काम उन्होंने लगभग दो महीने पहले शुरू कर दिया था। मिट्टी, लकड़ी, पुआल और रंग रोगन के जरिए प्रतिमाओं को अंतिम रूप दिया जाता है। उनके पास छोटे आकार से लेकर बड़े आकार तक की मूर्तियां उपलब्ध हैं, जिनकी कीमत एक हजार रुपये से शुरू होकर छह हजार रुपये तक जाती है। ग्राहक अपनी जरूरत और क्षमता के अनुसार मूर्ति का चयन कर रहे हैं।

एक अन्य मूर्तिकार प्रताप सरकार (sculptor, Pratap Sarkar) बताते हैं कि उनका परिवार लंबे समय से इस कला से जुड़ा हुआ है। उनके दादा और पिता भी मूर्ति निर्माण का काम करते थे। इस वर्ष उन्होंने करीब पचासी सरस्वती प्रतिमाएं तैयार की हैं। प्रतिमा निर्माण में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी को लेकर भी वे खास सावधानी बरतते हैं। उन्होंने बताया कि मूर्ति के लिए विशेष गंगा मिट्टी का उपयोग किया जाता है, जिसे कोलकाता से मंगाया जाता है। इससे प्रतिमाओं की गुणवत्ता और धार्मिक महत्व दोनों बने रहते हैं।

मूर्तिकारों के अनुसार सरस्वती पूजा उनके लिए केवल व्यवसाय नहीं बल्कि आस्था से जुड़ा कार्य है। हर प्रतिमा को वे पूरी श्रद्धा और मेहनत से गढ़ते हैं ताकि पूजा करने वालों को दिव्यता का अनुभव हो। कई कलाकार ऐसे भी हैं जो केवल बसंत पंचमी ही नहीं बल्कि दुर्गा पूजा, छठ पूजा और अन्य पर्वों के लिए भी साल भर प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं।

जिले में सरस्वती पूजा को लेकर बढ़ते उत्साह का असर बाजारों में भी देखा जा रहा है। पूजा सामग्री, सजावट के सामान और फूलों की दुकानों पर भीड़ बढ़ने लगी है। प्रशासन की ओर से भी शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैयारियां की जा रही हैं ताकि पर्व सौहार्दपूर्ण माहौल में संपन्न हो सके।

कुल मिलाकर बसंत पंचमी को लेकर बलरामपुर जिले में उत्सव का वातावरण है। सरस्वती पूजा न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक बन रही है, बल्कि यह स्थानीय कारीगरों और कलाकारों के लिए रोजगार और पहचान का भी माध्यम बनती जा रही है। 23 जनवरी को जब मां सरस्वती की प्रतिमाएं पंडालों में स्थापित होंगी, तब पूरे जिले में भक्ति, उल्लास और संस्कृति का संगम देखने को मिलेगा।

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