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MUMBAI : मेहनत से ही मिलती है सफलता

शख्सियत-शिवाजी सुतार डायरेक्टर (इनफार्मेशन एंड पब्लिसिटी,भारतीय रेल सेवा)

मेहनत से ही मिलती है सफलता

मुम्बई : गीता में लिखा है कि कर्म कर फल की चिंता मत कर। इस बात को हम वाक्य ही मानते हैं, पर आज हम आपको एक ऐसे व्यक्ति से मिला रहे हैं, जिनका जीवन इस बात की मिशाल देता है कि सच्चा कर्म आपको उस जगह पहुंचा देता है जहां आप पहुंचने के हकदार हैं। हम बात कर रहे हैं 2008 बैच के आईआरटीएस शिवाजी सुतार की। शिवाजी अब तक सेंट्रल रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी के तौर पर काम कर रहे थे। उनके बेहतरीन कार्य को देखते हुए उन्हें पदोन्नति देते हुए भारतीय रेलवे सेवा के इनफार्मेशन एंड पब्लिसिटी का डायरेक्टर बनाया गया है।

छोटी उम्र, बड़ा मुकाम
शिवाजी सुतार महाराष्ट्र के एक पिछड़े इलाके के गरीब परिवार से आते हैं। अथक मेहनत और सकारात्मक नजरिए ने उन्हें छोटी सी उम्र में लोकप्रियता के ऊंचे मुकाम पर पहुंचा दिया। अपने सकारात्मक नजरिए के चलते लगभग हर किसी के मन पर गहरी छाप छोड़ने वाले शिवाजी सेंट्रल रेलवे के सबसे अच्छे अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं। उनके चेंबर के दरवाजे हर आम आदमी के लिए खुले हुए हैं। उनकी सफलता का राज जानने के लिए आइए एक नजर डालते हैं उनके जीवन पर।

पिछड़े गांव में हुआ जन्म
शिवाजी सुतार का जन्म 28 दिसंबर 1982 में महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के शाहुवाड़ी तहसील के कोतोली गांव में हुआ। यह गांव वारणा नदी के किनारे बसा हुआ है। शंकर सुतार शिवाजी के बड़े भाई हैं और सबसे बड़ी बहन लता सुतार हैं, जो महाराष्ट्र पुलिस सेवा में इंस्पेक्टर के रूप में तैनात हैं। शिवाजी बताते हैं कि घर में हम पांच लोग थे। पिताजी मारुती सुतार (बढ़ई) का काम करते थे। आई (माताजी) बालाबाई सुतार घर का काम संभालती थी। हमारे पास थोड़ी सी खेती भी थी। हमारे गांव में लगभग 250-300 लोग हुआ करते थे। गांव एकदम पिछड़ा था। गांव के पास नदी होने से खेती में थोड़ा बहुत कुछ हो जाता था।

सीरियल से मिली प्रेरणा
हमारे गांव में 7वीं कक्षा तक स्कूल था। मेरी बड़ी बहन 7वीं कक्षा में थीं तब ऐसा लगा कि अब उन्हें स्कूल छोड़ना होगा, पर भगवान की दया से उस स्कूल में 10वीं तक की कक्षा शुरू हो गई। उन दिनों ‘उड़ान’ सीरियल टीवी पर आया करता था, मेरी दीदी अपनी सहेली के घर जाकर यह सीरियल देखती थीं। इस सीरियल ने उन्हें इतना प्रेरित किया कि उन्होंने उसी वक्त तय कर लिया कि उन्हें पुलिस इंस्पेक्टर बनना है।

3 बच्चों में किसे पढ़ाएं?
दीदी पढ़ने में बहुत अच्छी थी, तो 10वीं के बाद उन्होंने पिताजी से कहा कि मुझे आगे पढ़ना है और पुलिस इंस्पेक्टर बनना है। उस समय घर की हालत ऐसी नहीं थी कि तीनों बच्चों की पढ़ाई कराई जा सकती थी। पिता के पास दो ऑप्शन थे- दीदी की पढ़ाई रोकें और उनकी शादी कर दें और बाकी दो बच्चों को पढ़ाएं, या दीदी को पढ़ाएं और बाकी दो बच्चों की पढ़ाई रोक दें। पर पिता ने हम तीनों को पढ़़ाने का निश्चय किया।

खेती बेचकर बच्चों को पढ़ाया
पिता जी ने थोड़ी खेती बेची और दीदी को पढ़ने के लिए बाहर भेजा। इस बीच हमारे पास दो भैंस थी, उन्हें भी बेचना पड़ा। भैंस बेचने से हमारे पास दूध से होने वाली आय बंद हो गई। मेरे माता-पिता अनपढ़ थे, पर उन्होंने ठान लिया था कि हमें पढ़ाना है। गांव के बहुत से लोगों ने कहा कि लड़की है, इसे क्यों इतना पढ़ा रहे हो। पर पिता ने किसी की बात नहीं सुनी। दीदी ने साबित किया कि वे बहुत काबिल हैं। हमारी तहसील में स्नातक करने वाली वे पहली इंसान थीं। इससे पहले इस तहसील से कोई ग्रैजुएट नहीं हुआ था। दीदी के पीछे बड़े भाई की भी पढ़ाई चल रही थी, जिसके चलते हमारी आर्थिक स्थिति खराब होती गई। जब मैं 9वीं कक्षा में था तो दीदी पुलिस सब इंस्पेक्टर बन गईं।

बढ़ा कर्ज का बोझ
शिवाजी बताते हैं कि जब दीदी इंस्पेक्टर बन गईं तो हम सभी को बड़ी राहत मिली कि अब हमारी सामाजिक व आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। पर अब तक पिता ने हमारी पढ़ाई और घर खर्च के लिए बहुत सा कर्ज ले लिया था। भाई भी 12वीं की परीक्षा पास करके इंजीनियरिंग करना चाहते थे। दीदी का वेतन बहुत कम था। उन्होंने सबसे पहले तय किया कि पिता का कर्ज चुकाया जाए। भाई को पंढरपुर में इंजीनियरिंग में एडमिशन मिल गया। वे पढ़ने में अच्छे थे, तो फीस कम लगती थी, पर हॉस्टल तथा अन्य खर्च का पैसा जमा करना बहुत कठिन होता था।

मैंने स्कूल छोड़ने की सोचा
घर की हालत देखते हुए मैंने तय किया कि मैं स्कूल छोड़ देता हूं, ताकि घर की हालत में सुधार हो। पर गांव के कुछ लोगों ने कहा कि यह बच्चा हमेशा फर्स्ट आता है, बहुत अच्छा पढ़ रहा है, आप इसे पढ़ाएं हम आपकी मदद करेंगे। लोगों की मदद और स्कॉलरशिप की मदद से मैं कोल्हापुर में साइंस की पढ़ाई पढ़ने गया।

850 रुपए के चलते नहीं बना डॉक्टर
मैं वर्ष 2000 में 12वीं में अच्छे अंक से पास हो गया। मुझे न्यूरोसर्जन बनना था, इसके लिए मुझे सीईटी देनी पड़ती। पर उसका फार्म 850 रूपए का था। मेरे पास फार्म के पैसे नहीं थे। घर की हालत देखते हुए मैंने खुद को बताया कि अभी सही समय नहीं है कि घरवालों को परेशान किया जाए। उस समय मेरे बगल के गांव के विश्वास नागरे पाटिल आईपीएस और आनंद पाटिल आईएएस हुए थे। मैं उनसे जाकर मिला, उन्होंने मुझे बताया कि मैंने 12वीं साईंस ली थी, फिर उसे छोड़कर आर्ट्स की पढ़ाई की। इन्हें देखकर मैंने भी तय किया कि मैं भी सिविल सेवा में जाऊंगा।

खाने तक को नहीं होते थे पैसे
मैंने दीदी और बाकी घर वालों को बताया कि मैं सिविल सेवा में जाना चाहता हूं। उन्हें भी यह पसंद आया। पर सीईटी के चक्कर में मैंने कहीं एडमिशन नहीं लिया था, फिर क्या पुणे के सारे कॉलेज हमने छान मारे पर कहीं एडमिशन नहीं मिला। फिर दीदी ने मुझे मुंबई बुलाया और मैंने के. जे. सोमैया में एडमिशन लिया। मैंने तय किया कि किसी तरह से मुझे आईएएस बनना है। दो साल मैं दीदी के साथ रहा। पर तीसरे साल मुझे दीदी से अलग रहना पड़ा। दीदी की शादी हो चुकी थी। वे अपनी तरफ से हर मदद करने का प्रयास करती रहीं। पर सब बहुत कठिन था। मैंने कलीना हॉस्टल में एडमिशन लिया।

कोचिंग पढ़ाकर हुआ गुजारा
उस समय पिता के पास पैसे होते नहीं थे। दीदी की शादी हो चुकी थी, वे बड़े भाई, मुझे और अपने परिवार को एक साथ संभाल रही थीं। उस समय कोई दोस्त तो था नहीं जिससे मदद मांगी जा सकती थी। सो मैं दादर में शारदा आश्रम आया और वहां बच्चों को पढ़ाने की बात कही। उन्होंने मुझे 200 रूपए पर लेक्चर देने की बात कही। उस समय मेरे लिए वह बहुत बड़ी बात थी। मैं बच्चों को पढ़ाते हुए पढ़ रहा था, बीच में कभी दीदी पैसे दे देती थी, कभी पिता कहते थे ये गन्ने का पैसा आया है ले लो। इसी तरह से पढ़ाई चल रही थी। इस कोचिंग के चलते मेरी पढ़ाई हो नहीं रही थी।

किताबों को तीन हिस्सों में फाड़कर पढ़ाई
इस बीच मुझे पता चला महाराष्ट्र सरकार एक एसआईएसई नाम का संस्थान चलाती है। यह इंस्टिट़यूट छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के पास ही है, जो आईएएस की प्री कोचिंग की पढ़ाई कराती है। पूरे महाराष्ट्र से 25 बच्चों को चुना जाता है, जिन्हें यहां रहने की व्यवस्था होती थी। यहां हॉस्टल फ्री था, किताबें फ्री थीं और सरकार हर बच्चे को एक हजार रूपए हर महीने स्कॉलरशिप भी देती है। मैंने इसका एग्जाम दिया और 25 बच्चों में चुन लिया गया। मुझे एक साल की राहत मिली। इस बीच मैंने जमकर पढ़ाई की। हॉस्टल की किताबों के अलावा जो किताबें बाहर से लेनी होती थीं, हम एक किताब खरीदते थे। उसे तीन हिस्सों में फाड़ देते थे जिसमें से एक हिस्सा एक लड़का दूसरा हिस्सा दूसरा। ऐसे पढ़ते थे और फिर एक दूसरे को समझाते थे।

हर कोई कर सकता है अच्छा
मैं समझता हूं कि हर व्यक्ति के पास अच्छा करने का मौका होता ही है। मैं समझता हूं कि हर व्यक्ति अच्छा काम कर सकता है, सिस्टम में रहकर आप बहुत अच्छा काम कर सकते हैं। यह सही बात नहीं है कि सिस्टम आपको काम करने नहीं देता। अगर आपका अप्रोच ही अच्छा काम करना है तो आप कहीं भी कर ही लोगे। ऐसा नहीं है कि आपको गड़बड़ लोग नहीं मिलेंगे। पर अगर आप लगातार अच्छा काम करते रहोगे तो अच्छे लोग आपसे जुड़ते जाएंगे और गड़बड़ लोग गायब हो जाएंगे।

तारीफ करके भरा पेट
हमने मुंबई की हर लाइब्रेरी छान मारी। कभी-कभी हम वड़ापाव खाकर गुजारा करते थे। जब हम नेशनल बांद्रा लाइब्रेरी में पढ़ने जाते थे तो खाने को कुछ होता नहीं था। हमारे साथ दो लड़कियां भी तैयारी कर रहीं थी, हम उनके टिफिन की जमकर तारीफ करते और वे रोज हमारे लिए खाना लेकर आने लगीं। काफी समय हमारा उनके सहारे गुजरा। इस बीच मैं तीन महीने के लिए पुणे कोचिंग के लिए गया। वहां मैंने आईएएस का प्रिलिम्स एक्जाम पास कर लिया। अब मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया और लोग भी सामने आए और कहा कि हम आपको पढ़ाई में मदद करेंगे। इस बीच मैंने दिल्ली जाने का फैसला किया। मैं दिल्ली गया, मेंस एग्जाम भी दिया पर फाइनल लिस्ट में मेरा नाम नहीं आया। मैंने फिर से एग्जाम दिया और इस बार मेरा सलेक्शन हो गया। मैं फिर से तैयारी करने की सोची पर ट्रेनिंग शुरू हो गई और पढ़ाई हो नहीं पाई।

प्रेशर हैंडल करना सीखा
मैंने सेवा में रहते हुए बहुत कुछ सीखा। पर जब मैं जनसंपर्क अधिकारी बना तो बहुत सारे लोगों से रोज का मिलना जुलना हुआ। मैंने यहां समझा कि दूसरे विभागों के साथ कैसे काम किया जा सकता है। इधर कई बड़े, मंत्रालय स्तर के प्रोग्राम करने का मौका मिला तो हर छोटी बड़ी बात का बारीकी से ध्यान देना सीखा। यहां बहुत ज्यादा प्रेशर रहा, तो यहां पर प्रेशर हैंडल करना सीखा। मैं समझता हूं कि भारत में करने के लिए बहुत कुछ है। यहां अगर आप चाहें तो गरीब के लिए, देश के लिए, सिस्टम के लिए बहुत कुछ कर सकते है। मैं समझता हूं कि देश में कोई भूखा न सोए, किसी को पढ़ने के लिए सोचना न पड़े तो हम सफल देश हो जाएंगे।

पेट भरने से मिलती है खुशी
मेरे लिए खुशी के मायने यह है कि एक समय ऐसा था, जब मेरे पास खाने तक की दिक्कतें थी। किताब पढ़ते समय लगता था कि अब कोई मुझे खाने को दे, किसी तरह से पेट भरे। मैं जब किसी को भोजन कराता हूं तो मुझे बहुत खुशी मिलती है। जब मैं दुखी होता हूं, तो शांत रहता हूं। शांत रहने से समय के साथ दुख दूर हो जाते हैं।

पत्नी ने हर मौके में दिया साथ
एक सिविल सेवा के अधिकारी का जीवन बहुत कठिन होता है, ऐसे में पत्नी का रोल बहुत महत्वपूर्ण होता है। पत्नी सुवर्णा ने हर मौके पर मेरा साथ दिया। मैं समझता हूं कि दो लोगों का रिश्ता चलाने के लिए बस इतना गौर करने की जरूररत है कि जल्द गुस्सा न करें, जब नाराजगी हो तो थोड़ा समय चुप हो जाएं और फिर समय सब सही कर देगा।

बिना स्ट्रगल के कुछ नहीं मिलता
मैं समझता हूं कि जीवन में स्ट्रगल है। स्ट्रगल के बिना किसी भी फील्ड में कुछ नहीं मिलता। स्ट्रगल में इंसान पूरी तरह से परिपक्व हो जाता है। जीवन में ऐसा कभी नहीं होता कि आपने रात में जो सपना देखा सुबह वह पूरा हो गया हो। उसके लिए आपको दिन-रात एक कर देना होता है। अपना 100 प्रतिशत देने के बाद आपको सफलता से कोई नहीं रोक सकता।

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