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Jhansi : अस्तित्व चित्रकला प्रदर्शनी में चित्रों में उकेरी किन्नर की स्थिति

कला सोपान ने रानी लक्ष्मीबाई पार्क में आयोजित किया चित्रकला प्रदर्शनी

झांसी : किन्नर समाज का एक अभिन्न अंग हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में किन्नरों की संख्या 137465 थी, जो प्राप्त सर्वेक्षण में इनकी संख्या लगभग 164615 हो गई है। यानी 10 वर्षों में 27150 की वृद्धि हुई है। आज जरूरत है कि किन्नरों की स्वीकार्यता बढ़े और समाज में फैली विषमताओं को समाप्त किया जाए।

यह विचार कला सोपान द्वारा किन्नर पर आधारित चित्रकला प्रदर्शनी अस्तित्व की अध्यक्षता करते हुए बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी के अधिष्ठाता प्रो मुन्ना तिवारी ने व्यक्त किया।

प्रो तिवारी ने कहा कि कला के माध्यम से सामाजिक जागरूकता को नया आयाम दिया जा सकता है। सामाजिक जागरूकता के द्वारा ही किन्नरों को समाज में वांछित स्थान दिलाया जा सकता है। श्री तिवारी ने कला सोपान द्वारा आयोजित इस चित्रकला प्रदर्शनी के लिए सभी को शुभकामनाएं दी।

चित्रकला प्रदर्शनी के विशिष्ठ अतिथि चौधरी संतराम पेंटर ने कहा कि आज किन्नर समुदाय हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहा है। शिक्षा और जागरूकता ऐसे विषय हैं जिनसे किन्नर समाज आगे बढ़ रहा है और समाज में कंधे से कन्धा मिला कर काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि किन्नरों को रोजगार देकर अर्थव्यस्था को गति दी जा सकती है।

प्रदर्शनी की संयोजक एवं कला सोपान की अध्यक्ष डॉ. श्वेता पाण्डेय ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि इस चित्रकला प्रदर्शनी में झांसी जनपद के चयनित चित्रकारों की कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है। उन्होंने कहा कि आज जरूरत है कि कला को कला दीर्घा से बाहर निकाल कर सीधे समाज के सामने प्रदर्शित किया जाए। इसीलिए इस चित्रकला प्रदर्शनी का आयोजन रानी लक्ष्मीबाई पार्क में किया गया। पार्क में आए हुए लोगों ने प्रदर्शनी को देखा और कला कृतियों को प्रशंसा की।

किन्नर के जीवन पर आधारित कला सीरीज बनाने वाले चित्रकार गजेंद्र ने बताया कि किसी के जीवन को जी कर उसे रंगों के माध्यम से उकेरना और समाज को उससे रूबरू कराने का प्रयास चित्रों के माध्यम से किया गया है। उन्होंने बताया कि एक किन्नर की जिंदगी कितनी कष्ट में होती है इसे जानने के लिए एक दिन किन्नर रूप में बाहर निकल कर देखना होगा। उनको महसूस करना होगा और उनसे जुड़ने का प्रयास करना होगा।

कला सोपान के सचिव डॉ. उमेश कुमार ने अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मानव और पशु अथवा पक्षी संयुक्त भारतीय कला का एक अभिप्राय। इसकी कल्पना अति प्राचीन है। शतपथ ब्राह्मण में अश्वमुखी मानव शरीरवाले किन्नर का उल्लेख है। बौद्ध साहित्य में किन्नर की कल्पना मानवमुखी पक्षी के रूप में की गई है। मानसार में किन्नर के गरुड़मुखी, मानवशरीरी और पशुपदी रूप का वर्णन है। इस अभिप्राय का चित्रण भरहुत के अनेक उच्चित्रणों में हुआ है।

इस चित्रकला प्रदर्शनी में गजेन्द्र, नंदनी, मेघा, अलादीन, मोहित, ब्रजेश पाल, रेखा आर्य सिद्धार्थ, प्रतीक्षा, रौनक आशीष, पायल एवं अन्य की कृतियों को प्रदर्शित किया गया है ।

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