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New Delhi : दो साल के कार्यकाल में न्यायमूर्ति विक्टोरिया गौरी को बहुत कुछ साबित करना होगा

नयी दिल्ली: (New Delhi) मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ के समक्ष केंद्र का प्रतिनिधित्व करने वाली महिला वकील लक्ष्मण चंद्र विक्टोरिया गौरी एक बार फिर सुर्खियों में रहीं, लेकिन इस बार वजह उनकी ‘धार्मिक’ टिप्पणियां नहीं, बल्कि अतिरिक्त न्यायाधीश के तौर पर उनकी नियुक्ति रही।वकील विक्टोरिया गौरी को मद्रास उच्च न्यायालय में बतौर अस्थायी न्यायाधीश नियुक्त करने की उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम की सिफारिश पर केंद्र सरकार की मुहर लगते ही विरोध के स्वर फूट पड़े और मद्रास उच्च न्यायालय के कुछ वकीलों ने उनकी नियुक्ति पर रोक को लेकर शीर्ष अदालत का रुख किया।इतना ही नहीं, विधिक और न्यायिक बिरादरी में इस फैसले को लेकर जुबानी जंग और वाद-विवाद शुरू हो गया। इन सबकी आड़ में विक्टोरिया गौरी की मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ कथित नफरती टिप्पणी और उनकी राजनीतिक संबद्धता को आधार बनाया गया।

दरअसल, न्यायमूर्ति विक्टोरिया गौरी वकालत के पेशे में रहते हुए भारतीय जनता से जुड़ी रही हैं और विभिन्न मामलों में केंद्र सरकार की पैरवी करती रही हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ कथित विवादास्पद टिप्पणियां करते हुए इस्लाम को ‘हरा आतंक’ और ईसाइयत को ‘सफेद आतंक’ बताया था।उन्होंने कहा था, ‘‘जैसे इस्लाम ‘हरा आतंक’ है, उसी तरह ईसाइयत ‘सफेद आतंक’ है। वहीं भारत में ईसाई इस्लाम से ज्यादा खतरनाक हैं। लव जिहाद के मामले में ये दोनों ही एक जैसे हैं।’’

न्यायमूर्ति गौरी तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के दूरदराज के गांव पश्चिम नेयूर से ताल्लुक रखती हैं और एक ‘बेहद साधारण परिवार’ की पहली पीढ़ी की वकील रही हैं। उनके परिवार में पति तुली मुत्थू राम और दो बेटियां हैं।गवर्नमेंट लॉ कॉलेज मदुरै से विधि स्नातक करने वाली न्यायमूर्ति गौरी ने मदर टेरेसा वीमेन्स यूनिवर्सिटी से विधि स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। उन्होंने 1995 से वकालत का पेशा शुरू किया। भाजपा-नीत केंद्र सरकार ने 2015 में मद्रास उच्च न्यायालय में वरिष्ठ सरकारी वकील नियुक्त किया था और पांच वर्ष बाद उन्हें सहायक सॉलिसिटर जनरल बनाया गया।

वह कॉलेज के दिनों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अनुषंगी इकाई सेवा भारती से जुड़ी रही हैं। अक्टूबर 2010 में वह भाजपा के केरल महिला मोर्चा की प्रमुख नियुक्त की गयीं। उन्हें 2016 में भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय सचिव बनाया गया।न्यायमूर्ति गौरी के शपथग्रहण के साथ ही उनकी नियुक्ति को लेकर विवाद भले ही थम गया हो, लेकिन निश्चित तौर पर उनके दो साल का कार्यकाल आसान नहीं रहने वाला, क्योंकि उन्हें यह साबित करना होगा कि उनकी टिप्पणियों और राजनीतिक संबद्धता को लेकर उठाये गये सवाल ‘पूर्वाग्रह’ से ग्रसित हैं।

न्यायाधीशों की राजनीतिक संबद्धता का प्रश्न कोई नया या अनोखा नहीं है। देश के न्यायिक इतिहास में ऐसे कई उदाहरण अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं, जहां राजनीतिक संबद्धता रखने वाला व्यक्ति न्यायाधीश की कुर्सी तक पहुंचा है। हालांकि, हाल के दिनों में विक्टोरिया गौरी की नियुक्ति का मामला संभवत: ऐसा पहला विवाद होगा, जिसमें कॉलेजियम की सिफारिश और तत्पश्चात सरकार द्वारा उसे दी गयी मंजूरी अदालती कठघरे में खड़ी कर दी गयी और नियुक्ति आदेश पर रोक की गुहार लगायी गयी।

हालांकि नाटकीय घटनाक्रम में हुई सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने विक्टोरिया गौरी के सात फरवरी को शपथग्रहण से ऐन पहले उनके नियुक्ति आदेश पर रोक संबंधी अनुरोध पर विचार करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि नियुक्ति की उपयुक्तता के मसले पर सुनवाई नहीं की जा सकती और इसके साथ ही विक्टोरिया गौरी के अतिरिक्त न्यायाधीश के तौर पर शपथग्रहण का रास्ता साफ हो गया।

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