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रिल्के (1875-1925) का पत्र फ्राउ जूली के नाम

वो परिपक्व नारी है का प्रतीक है

जर्मनी के प्रख्यात कवि राइनेर मारिया रिल्के का लेखन ही नहीं, उसकी जीवन-शैली भी आदशों, प्रेम और एक खास किस्म की रोमानियत से ओत-प्रोत रही। अपनी ही तरह एक रचनाशील कलाकार क्लैरा से विवाह भी उन्होंने अपने इन्हीं आदर्शों और एक स्वप्नदृष्टा के जीवन-लक्ष्यों के तहत किया। यह पत्र उन्होंने अपनी पत्नी-प्रेयसी के बारे में अपनी एक परिचिता फ्राउ जूली को लिखा था।

25 जून, 1902

जूली,

पिछली बार जब मैंने तुम्हें पत्र लिखा था, (करीब एक वर्ष पहले) तो अपने विवाह के बारे में बताया ही था। मेरे जीवन से बहुत अंतरंगता से जुड़ी यह नवयुवती एक शिल्पकार है और उसे महान रौदां के साथ भी कुछ समय पेरिस में काम करने का गौरव प्राप्त है। वह बहुत प्रतिभाशाली और कुशल शिल्पी है। एक ऐसी कलाकार, जिसके द्वारा मूर्तिशिल्प में महत्वपूर्ण योगदान की मुझे पूरी उम्मीद है। एक-दूसरे की कला का सम्मान और एक-दूसरे के प्रति गहरा विश्वास हमें एक-दूसरे के बहुत करीब ले आया। इस दिसम्बर में उसने हमारी एक प्यारी सी बच्ची को भी जन्म दिया, जिसका नाम हमने थ रखा है। नन्हीं थ ने हम दोनों के जीवन को प्रेम और समृद्धि की भावना से भर दिया है। मेरा हमेशा से यही विचार रहा है कि बच्चे को जन्म देकर एक स्त्री न केवल पूर्णता को प्राप्त कर लेती है, बल्कि वह असुरक्षा और अज्ञान की भावना से भी मुक्त हो जाती है। आध्यात्मिक स्तर पर भी यह एक स्त्री की परिपक्वता का प्रतीक है।

मुझे इसमें कतई संदेह नहीं कि एक रचनाशील स्त्री – जो एक मां भी है और अपने बच्चे से भरपूर प्रेम करती है – एक परिपक्व और गहरी कलाकार होती है। अपनी कलात्मक उड़ानों में वह वे सभी बुलंदियां छू सकती है, जिन्हें छूने की महान पुरुष कलाकार उम्मीद करते हैं। कुल मिलाकर अपने व्यक्तिगत जीवन में एक परिपूर्ण स्त्री किसी महान पुरुष कलाकार के समान ही होती है, इसलिए उसे पूरा अधिकार है कि वह अपनी कला के क्षेत्र में ऊंची-से ऊंची महत्वाकांक्षाएं पाले और उन्हें साकार करे।

यह सब मैं इसलिए लिख रहा हूं, क्योंकि मैं इस कलाकार स्त्री को, अपनी पत्नी को, उसकी रचनाशीलता में पूरा सहयोग और पूरी स्वतंत्रता देना चाहता हूं। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह एक कलाकार इंसान को दूसरे कलाकार इंसान को देनी चाहिए। क्लैरा के साथ मेरे विवाह का यही अर्थ है, लेकिन मैंने तुम्हें यह सब बताने के लिए पत्र नहीं लिखा है। मैं दरअसल तुम्हें अपने बारे में बताना चाह रहा था।

अब मेरे सामने यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया है कि अपनी मंजिल की तरफ बढ़ने के लिए मुझे कुछ ‘सामग्री’ चाहिए। मैं कुछ समय तक सिर्फ चिंतन-मनन करना चाहता हूं, बिना कुछ लिखे किसी शांत जगह पर जाकर सिर्फ सोच-विचार करना। अपनी पिछली दो रूस यात्राओं में मुझे अपने और अपने काम के बारे में काफी कुछ जानने-समझने का मौका मिला। अब मैं पतझड़ आते ही फिर निकलने की सोच रहा हूं, इस बार पेरिस की तरफ। मैं लाइब्रेरियां छान डालना चाहता हूं, रोदा के बारे में बड़ी शिद्दत से कुछ लिखना चाहता हूं – जिसके प्रति मेरे मन में बहुत प्रेम और सम्मान है और इसके – अलावा और भी बहुत कुछ। क्योंकि यह तो मुझे दिखाई दे रहे भविष्य का एक छोटा-सा हिस्सा मात्र है।

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