
महान फ्रेंच साहित्यकार जीव-जैक रूसो का कहना था कि जीवन में एक ही स्त्री से उसने पहला और आखिरी प्रेम किया था और वह थी उसके मित्र से लांबर्त की उपपत्नी काउंटेस सोफी हुदैत। रूसो तब पैंतालीस वर्ष का हो चला था, जब खूब तपिश भरे इस इसक का चस्का उसे लगा।
तुम्हारी शर्म से झुकी आंखें क्या मैं दोबारा कभी न देख पाऊंगा?
जून, 1757
आओ सोफी, मैं तुम्हारे अन्यायी हृदय को इतनी यातना दूं कि मैं तुम्हारे प्रति निष्ठुर महसूस कर सकूं। मैं तुम्हें क्यों बख्शू, जब तुमने मेरा विवेक, मेरा सम्मान, मेरा जीवन, मेरा सब कुछ छीन लिया है? में तुम्हारे दिनों को चैन से क्यों गुजरने दूं, जब तुमने मेरे दिनों में इतनी बेचैनी भर दी है! आह, तुम कितनी कम क्रूर होतीं, अगर तुमने मेरे हृदय में एक खंजर भोंक दिया होता, बजाय उस अलौकिक हथियार के, जो मुझे मार डाल रहा है! देखो, मैं क्या था, और क्या हो गया हूं। देखो, तुमने किस सीमा तक मुझे गिरा दिया है। जब तुमने मेरी बनने का फैसला किया था, तो मैं एक आदमी से कुछ ज्यादा ही था और जबसे तुमने मुझे अपने-आपसे दूर किया है, मैं सबसे निरीह प्राणी की तरह हो गया हूं। मेरी सारी तर्कशक्ति, सारी समझ, सारी हिम्मत जाने कहां चली गई है। एक तरह से तुमने मेरा सब कुछ छीन लिया है! तुम अपनी ही किसी कृति को इस तरह कैसे नष्ट कर सकती हो? तुम उसी को अपने मान के अयोग्य कैसे ठहरा सकती हो, जिसे तुमने ही एक दिन बड़े चाव से अपने सम्मान से उपकृत किया था।
आह सोफी, मैं तुमसे विनती करता हूं, उस मित्र को लेकर शर्मिंदा न होओ जिसे कभी तुमने इतना पसंद किया था। तुम्हारे खुद के सम्मान के लिए ही मैं जानना चाहता हूं कि मैं क्या हूं। क्या मैं तुम्हारी संपत्ति नहीं हूं? क्या तुम्हारा मेरे ऊपर कब्जा नहीं है? तुम इससे इनकार नहीं कर सकतीं, और, क्योंकि मैं तुम्हारा हूं, इसलिए मुझे कम-से-कम तुम्हारा बने रहने की इजाजत तो दे दो। खुशियों की उन घड़ियों के बारे में सोचो, जिन्हें यातना में झुलसता मैं कभी नहीं भुला पाऊंगा। वह अदृश्य ज्वाला जिसने मेरी आत्मा और मेरी इंद्रियों को यौवन का एक नया एहसास दिया। मेरी भावनाओं की लौ ने मुझे तुम्हारी ऊंचाई तक उठा दिया था। कितनी कितनी बार तुम्हारे प्रेमभरे हृदय को मेरे हृदय ने छुआ था। कितनी-कितनी बार तुम मुझे झरने के किनारे कहा करती थीं, ‘तुम सबसे विनम्र प्रेमी हो, किसी भी पुरुष ने तुम्हारे सरीखा प्रेम नहीं किया होगा!’ यह कितनी बड़ी विजय थी मेरे लिए, तुम्हारे होठों से यह स्वीकारोक्ति सुनना! हां, यह सच था! यह उस चाहत के अनुकूल था, जो मैं तुम्हारे भीतर भी जगा देना चाहता था वह चाहत जिसका अब तुम इतनी कटुता से अफसोस कर रही हो…
ओ सोफी! उन मीठी घड़ियों के बाद सदा का विछोह उसके लिए कितना असहनीय है, जो तुमसे फिर से जुड़ न पाने के कारण बहुत ज्यादा उदास है। उफ, तुम्हारी शर्म से झुकी आंखें क्या मैं दोबारा कभी न देख पाऊंगा, जो मेरे भीतर कामुक इच्छा का एक उन्माद-सा भर देती थीं? क्या मैं फिर से उस स्वर्गिक सिहरन को, उन पगलाती, लहराती अग्नि-लपटों को नहीं देख पाऊंगा, जो आसमानी बिजली से भी ज्यादा तेज कड़कती थी. … आह, वह अवर्णनीय पल! कौनसा हृदय, कौनसा देव तुम्हें अनुभव कर लेने के बाद भुला पाएगा?
तुम्हारा
रूसो


