
आप कुंडलिनी को पैसा दिखाकर जागृत नहीं कर सकते। वो वही चीज है जो मनुष्य कर सकता है कि वो पैसे से लुभा सकता है लोगों को। लेकिन कुंडलिनी एक जीवंत शक्ति है। शुद्ध इच्छा है। और कोई भी शुद्ध मनुष्य पैसे से जीता नहीं जा सकता है, ना खरीदा जा सकता। इसलिए जान लीजिए कि कोई भी आदमी आपसे कहे कि आपके कुंडलिनी जागरण का इतना पैसा दो या आपके आत्मसाक्षात्कार का इतना पैसा दो, तो उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। लेकिन फिर यह प्रश्न किया जाता है कि यह धर्म शक्ति क्यों बढ़ाई जाए? और धर्म में शक्ति रहने से क्या फायदा होता है? जो बिल्कुल पर्याप्त है, सही बात है। कि अगर आप धर्म पर बात कर रहे है, संतुलन की बात कर रहे हैं, और अति में नहीं जाना चाहिए अगर इसकी बात कर रहे हैं, तो आखिर क्यों? जब आप कोई प्लेन को देखते हैं तो, जो आकाश में उड़ता है, उसकी उड़ान से पहले देखा जाता है कि वो संतुलित है या नहीं है, उसके सब पेच कसे हुए हैं या नहीं है, और सब पूरी तरह से जुड़ा हुआ है या नहीं है। उसी प्रकार धर्म से मनुष्य में वो शक्ति आती है जिस से कि वो उड़ान कर सकता है। उसकी उड़ान बहुत आसान और बिल्कुल सीधी पहुंचती है अपने लक्ष्य की ओर जब वो धर्म में खड़ा होता है। बाहर के धर्मों की में बिल्कुल नहीं बात कर रही हूं। अंदर के अपने धर्म होते हैं।
जैसे कार्बन की वैलेंसीज चार हैं ये उसके धर्म हैं। कार्बन का धर्म है कि उसकी चार वैलेंसीज हैं। और उसी प्रकार हमारी दस वैलेंसी है। हमारे दस धर्म है। उन दस धर्मो को हमें संभालना चाहिए। और जब तक हम उन दस धर्मों में संतुलित नहीं होते हैं, तब तक हमारी उड़ान नहीं हो सकती। वो साढ़े तीन लपेटे में जैसे कि एक कागज को आप लपेट लीजिए,जैसे मध्य नाड़ी है, और उसके जो बीच का हिस्सा है बहुत सूक्ष्म है, उसके अंदर से कुंडलिनी एक बिल्कुल छोटे से बाल की तरह उठकर के छेद देती है ब्रह्मरंध्र को। उसके बाद ऊपर से परमात्मा की जब करुणा बहने लगती है, तब और उसके साथ में बहुत सारे ऐसे ही केस के जैसे, बिजली की तरह तार जैसे तार उठते हुए, कुंडलिनी छः चक्रों में भेदती हुई ऊपर तक चली जाती है।
जो आदमी संतुलन में रहता है, जिसने हमेशा धर्म का पालन किया है, जो धर्म में रहता है, अपने गौरव से रहता है, ऐसे आदमी की कुंडलिनी–खट से–पूरे के पूरे ब्रह्मरंध्र को छेद कर के ऊपर चली जाती है। ऐसे हमारे यहां कुछ लोग हैं, लेकिन वो देहातों में रहते हैं, शहरों में नहीं।
अभी थोड़े दिन की बात है, हम देहातों में ज़्यादा घूमते हैं आप जानते हैं। चार-पांच वीक हुए होंगे, एक गांव है, मस्त गांव, जो की बहुत ही, बहुत ही छोटा गांव है। और उस गांव में बहुत दूर-दूर से लोग अपनी बैलगाड़ी में पैदल आते हैं हज़ारों कि तादाद में, हज़ारों कि तादाद में। और कुछ नहीं मैंने कहा ऐसे हाथ करो, और थोड़ा सा संतुलन दिया, ‘बताओ कितनों के हाथों में ठंडक आ रही है?’ सब के सब ने हाथ उठा दिए और सब ने बता दिया कि हम पार हो गए। और बस खुश हो गए, उनकी शक्लें ही बदल गई। और आप कहते हैं कि मां आप तो देहाती लोगों को ज्यादा पसंद करती हैं। उन्हीं को आप देखती हैं, और जो है उनको नहीं जानती।


