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प्रसाद के नाम रामसिंह का पत्र

प्रिय बाबू साहब,

तितली, झरना और लहर के लिए अनेक धन्यवाद । मैंने आपकी रचनाओं को बड़ी लगन और प्रेम के साथ पड़ा ‘झरना’ और ‘लहर’ में आपकी रसमयी काव्योद्भावनायें संगीत निर्भर के रूप में अनवरत प्रवाहित हुई हैं और उनमें मानव हृदय की कोमल भावनाएं लहरियों की तरह खूब लहराई हैं। खड़ी बोली का खड़ापन यदि किसी महाभाग आधुनिक कवि की रचना में नहीं खटकता है तो वह आपही की मधुवर्षिणी कविता में भरना और लहर की स्वच्छन्द कविताएं हिन्दी काव्यकोष की अचल स्थायी सम्पत्ति हैं जो अपनी मर्म स्पर्शिता और सरल सुखदता के कारण उत्तम काव्य के भक्तों के गले का हार बनेंगी और जिनसे हिन्दी कविता एक नवीन प्रशस्त और दिव्य मार्ग पर अग्रसर होगी।

परंतु विशेष रस मुझे मिला आपकी तितली पढ़कर मेरी ऐसी धारणा है कि ‘तितली’ उपन्यास जगत में हिन्दी की उत्तम सफल रचना हुई है जो ख्यात है।

नामा लेखक की प्रतिष्ठा के सर्वथा योग्य है। ग्राम जीवन का ऐसा सजीव, सूक्ष्म और अनुरजनकारी चित्र हिन्दी साहित्य में कम देखने को मिला है । विशेषतः गर्वोन्मत्त निष्ठुर जमींदारों और मूक ग्राम्य जनता के पारस्परिक व्यवहारों का और उनके सुख-दुःखों का चित्र चित्त पर गहरी छाप डालता है । मधुवन और तितली तथा उनके मित्र और विपक्षियों के चरित्र चित्रण में कला और मनोविज्ञान की दृष्टि से कमाल ही कर दिया है । तितली को पढ़कर हिन्दी के अन्य उपन्यास फीके पड़ गए। इसकी हृदय को खींचने वाली भावप्रधान शैली, कलकत्ते के विषय निमज्जित नारकी जीवन के रोमांचकारी दृष्य, पापाचार, पाखंड और विविध भावावेशों की प्रबलता, साथ ही दूसरी ओर जीवन की सरल निश्छलता और गरीबी के दृश्य जटिल जीवन संग्राम के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि और स्वाभाविक चित्रपट से प्रतीत होते हैं और उनमें ईश्वरीय करुणा और मानवीय दया और सम्वेदना का ऐसा सुन्दर सम्मिश्रण हुआ है कि जितनी प्रशंसा की जाय थोड़ी है ! कितना सराहनीय है तितली का त्याग, कष्ट सहिष्णुता, आत्मावलम्बन और प्रेम – कितना मर्मस्पर्शी और सुन्दर है तितली और मधुवन का पुनर्मिलन — उपन्यास का अन्त । इसको पढ़ कर मुझे चार्ल्स डिकिन्स का स्मरण हो आता है विशेषतः उसके डेविड कापर फील्ड का । फिर भी दोनों में बड़ा अन्तर है। आपकी रचना पर भारतीय दर्शन की गहरी छाप है और अपने अन्त तक अपनी कहानी को गम्भीरता के साथ निभाया है और उसको अपनी सभ्यता के गहरे रंग में रंगा है। डिकिन्स की रचना में उनका विनोदी स्वभाव बार-बार फूट पड़ता है जिसका सबसे सुन्दर परिपाक उनके Picknick papers में हुआ है। उनकी सारी रचनाओं में वही चंचल चित्तवृत्ति और हास्य रेखा दिखाई देती है। दोनों की शैली में भी बड़ा भेद है। समता है तो केवल इतनी कि दोनों ने बड़े नगरों के दरिद्र और दुखी जीवन ( slum life) का सजीव वर्णन किया है, सरलता और छलकपट दोनों का एक-सी सफलता के साथ चित्रण किया है, दोनों में सहानुभूति पूर्ण मनुष्यता और मनोविज्ञान की बारीकियां देखने को मिलती हैं और दोनों को ही अपनी-अपनी मातृभाषा पर पूर्ण अधिकार है।
तितिली को पढ़कर जो आनन्द की लहरियां हृदय में उठीं उनमें से कुछ को अपनी टूटी-फूटी भाषा में बांध कर आपके मनोरंजन के लिए ऊपर रख दिया है, आपको कम से कम हंसी तो आएगी।

आपसे मिलने की बड़ी इच्छा रहती है। आप तो काशी को छोड़ते नहीं । मैं ही जब बनारस आऊंगा तब मिलूंगा। आपका स्वास्थ अब कैसा है? हम तो ईश्वर से यही मनाते हैं कि आपको सुखी रखे जिससे आप सदा हिंदी, हिंदू, हिंद का गौरव बढ़ाते रहें। कुशल समाचारों का पत्र लिखें । मेरे योग्य सेवा लिखें।
स्नेहाधीन, रामसिंह

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