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रोजाना एक कविता : आज पढ़ें कवि आरती श्रीवास्तव की कविता एक ख़्वाब को टूटकर

एक ख़्वाब को टूटकर बिखरते हुए बहुत पास से देखा हमने..
एक कली को मुरझाकर गिरते हुए बहुत पास से देखा हमने..
था ज़िंदगी की दौड़ में शामिल वो भी..
था ज़िंदगी की दौड़ में शामिल वो भी
उस ज़िंदगी को मौत की आग़ोश में सोते हुए बहुत पास से देखा हमने..
नींद गहरी थी बहुत गहरी कि आँख खुल न सकी…
अर्श पर बिखरे सितारों सी चमक दिख ना सकी..
आज उन बोलती आँखों की ख़ामोशी को बहुत पास से देखा हमने..
ये उजालों की कशिश लेके कहाँ आ पहुँची..
ख़ुद को खो देने की ज़िद लेके कहाँ आ पहुँची..
बात छोटी सी थी पर समझने में देर लगी..
डर अन्धेरों से था पर उजालों में ही ठेस लगी..
था अन्धेरों से लड़कर जीतने का ग़ुरूर जिन्हें..
उन्ही को रोशनी की चकाचौंध में गिरते हुए बहुत पास से देखा हमने..
ज़ुबाँ ख़ामोश हुई शब्द हार मान गए..
ख़्वाहिशें इस क़दर टूटीं की ज़िंदगी हार गए..
लड़ाई ख़ुद से थी वो ढूँढते रहे दुश्मन..
हुआ जो सामना ख़ुद से तो लड़ने की अदा भूल गए..
उठे थे जोश में थी आज़माइश की हसरत..
ख़ुदी को ख़ुद से हारते हुए बहुत पास से देखा हमने…
ख़ुदी को ख़ुद से हारते हुए बहुत पास से देखा हमने….

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