spot_img
Home latest रोजाना एक कविता : आज पढ़ें कवि गोलेन्द्र पटेल की कविता लकड़हारिन...

रोजाना एक कविता : आज पढ़ें कवि गोलेन्द्र पटेल की कविता लकड़हारिन (बचपन से बुढ़ापे तक बांस)

0
272

तवा तटस्थ है चूल्हा उदास
पटरियों पर बिखर गया है भात
कूड़ादान में रोती है रोटी
भूख नोचती है आंत
पेट ताक रहा है गैर का पैर

खैर जनतंत्र के जंगल में
एक लड़की बिन रही है लकड़ी
जहां अक्सर भूखे होते हैं
हिंसक और खूंखार जानवर
यहां तक कि राष्ट्रीय पशु बाघ भी

हवा तेज चलती है
पत्तियां गिरती हैं नीचे
जिसमें छुपे होते हैं सांप, बिच्छू, गोजर
जरा सी खड़खड़ाहट से कांप जाती है रूह
हाथ से जब जब उठाती है वह लड़की लकड़ी
मैं डर जाता हूं …!