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रोजाना एक कविता : आज पढ़ें परागमांदले की कविता मुझे तुमसे नफ़रत है गांधी

मुझे तुमसे नफ़रत है गांधी
बेहद, बेइंतिहा नफ़रत,
मेरी इस नफ़रत की तरह ही
अनंत हैं
तुमसे नफ़रत करने की वजहें भी।

याद है तुम्हें
जब मिले थे तुम मुझसे
सबसे पहले लंदन में,
कितने साधारण,
कितने प्रभावहीन थे तुम,
मेरे प्रभावलय की तुलना में,
सच कहो
कौन जानता था तब तुम्हें
अपने ही देश में?
मगर उसके कुछ ही सालों बाद
जब मैं बंद था कालापानी में,
किसी धूमकेतु की तरह तुम
भारत की राजनीति में आए
और सूर्य की तरह इस तरह से छाए
कि फिर मेरे जैसे कई जुगनू
उस रोशनी में धुंधलाए।

जज के सामने
अपने किए को कबूल करके
उसके लिए सजा की मांग करने वाले
कायर गांधी
क्या तुम्हें कभी यह बात समझ में आई
कि छः-छः बार लिखकर
माफी मांगने के लिए
लगता है कितना साहस
और कितनी चतुराई?

अनशन करके
अपनी हड्डियां गलाने वाले
अधनंगे फकीर
क्या कभी तुम्हारी यह समझ में आया
कि कालापानी की सजा भुगतते हुए भी
मैंने अपना वजन किस तरह से बढ़ाया?
मुझे नफ़रत है तुमसे
कि इस देश की जनता ने
तुम्हारी साधारण, दो टुके बातों को
हमेशा माना बड़ी,
और वे बातें
मेरी लिखी अलंकारिक किताबों पर
हमेशा भारी पड़ीं।

असहमतियों के बावजूद
विश्वकवि ने
तुम्हें महात्मा कहा,
जनता ने बापू
और जिसका विरोध किया तुमने
उसी सुभाष ने तुम्हें राष्ट्रपिता कहा,
जबकि
‘वीर’ कहलाने के लिए
मुझे छद्म नाम से
अपनी ही जीवनी को लिखना पड़ा।

‘गीता’ को अपनी शक्ति का स्रोत बताने वाले
और प्रार्थना सभाओं में
भजन गाने वाले
तुम तो बन गए
सर्वधर्म सद्भाव के प्रतीक,
तुम्हें क्या पता कि
अपने आकाओं की स्वामीभक्ति में
एक नास्तिक से सांप्रदायिक हिंदू होने के लिए
मैंने तोड़ी कितनी लीक।

व्यक्तिगत संपत्ति का त्याग कर
बिना श्रम किए
एक कौर न खाने वाले तुम
फटेहाल गांधी
अंग्रेजों से पेंशन पाने की चतुराई
कहाँ से लाओगे?
ध्येय की खातिर
अस्वाद का गुणगान करने वाले
नीरस गांधी
माँस, मछली और मदिरा का स्वाद
क्या कभी जान पाओगे?

मुझे नहीं पता
कि अंग्रेजों का विरोध करके भी
उनसे घृणा न करने का तरीका
तुमने कहाँ से लिया,
मगर मैंने तो आख़िरी समय तक
उनके नमक का हक अदा किया।

नोआखली में जाकर
दंगे के शिकार हिंदुओं को बचाने वाले वाले तुम
क्या खाकर मेरी बराबरी कर पाते?
हिंदुत्व का झंडाबरदार होकर भी
मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार बनाने
और अखंड भारत की बात करते हुए भी
यह देश एक न रह पाए, इसलिए दंगे भड़काने की कला में
क्या कभी पारंगत हो पाते?

मुझे नफ़रत है तुमसे
कि तुम्हारी हत्या की साजिश को
कामयाब बनाने के बावजूद
मैं तुम्हें मार नहीं पाया,
तुम्हारे बाद भी
मुझे एकाकी जीवन के अंधेरों में धकेल
इस देश की अधिकांश जनता ने
तुम्हारा ही गौरव-गान गाया।

मगर याद रखना
तुम्हारे प्रति
मेरी यह अंतहीन घृणा
एक दिन तो रंग लाएगी,
मेरी यह घृणा
पीढ़ी दर पीढ़ी
मेरे चंद चाहने वालों के डीएनए में
शामिल हो जाएगी।
एक दिन तो आएगा
जब तुम्हारी जगह
राष्ट्रपिता के सिंहासन पर
बड़ी धूमधाम से
वो मुझे बैठाएंगे,
और जीवन भर
तुम्हें बदनाम करने की कोशिश करने वाले
एक दिन
मुझे नाहक बदनाम किए जाने का आरोप
तुम्हारे चाहने वालों पर लगाएंगे।

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