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रोजाना एक कविता : आज पढ़ें प्रियंका दुबे की कविता होंठों के जूते

होंठ चूमने वाले
प्रेमियों से भरे इस संसार में,
तुमने हमेशा
पिछले दिन की थकन में डूबे
मेरे सोते पैरों को चूम कर
सुबह जगाया है मुझे.

“फुट फ़ेटिश है तुम्हें”,
कहकर अपने पैर कंबल में समेटते हुए
झिड़क सा दिया था मैंने तुम्हें
एक दुपहर.

जवाब में तुमने,
कुछ कहा नहीं.

सिर्फ़ इतना प्रेम किया मेरे पैरों को,
कि मुझे लगने लगा जैसे
मैं जूतों की जगह
तुम्हारे होठों को पहने घूमती रही हूँ.

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