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सरगोशियां : बांस की ‘विरह-व्यंजना’…सुन रहे हो न!

कल तक वृक्ष का श्रृंगार रहे पत्ते, उसके ही तले अजनबी हैं। बेपरवाह वृक्ष, नई कोपलों के प्रेम में उन्मत्त हैं। उन्हें पोसने को जड़ से लेकर तने तक श्रम कर रहे हैं।

ऐसा लगता है, यह बिखरे पत्ते नहीं, मेरे ही असिद्ध संकल्प छितराएं पड़े हों। और, जिन्हें पोसा जा रहा है वह कामनाएं हैं।

इस मौसम की बयार में पुराने चोट और उसकी पीड़ाएं उभर आती हैं। ‘जोड़’ दुखने लगते हैं। यह बांसों से अच्छा कौन जानता है!

बयार चलने पर बांस के झुरमुट में क्रंदन हो रहा है। उसके बयान में वियोग के कितने आख्यान हैं! जोड़-जोड़ दुःख रहा है। देह हो या संबंध…गांठें होना कितना दुःखद है। और, उससे अधिक दुःखद है बसंत को भोगना….तुम सुन रहे हो न उनकी…….’विरह – व्यंजना’!

उधर, मञ्जरियों के मिट जाने पर फल आकार लेंगे। उस फल को प्राप्त करने की कुटिल कामना सहेजे रचा गया तुम्हारा ‘अभिनंदन गीत’ मुझे रुच नहीं रहा है।

सच कहूं तो,,

…..बसंत मुझे रुच नहीं रहा। मैं शरद की प्रतीक्षा तक इससे अलिप्त रहना चाहता हूं। जिसे बीत जाना है, वह बसंत है।
जो बीत रहा है, वह बसंत है….लेकिन, शरद चाहना है। वेदों ने भी ‘सौ शरद’ का जीवन मांगा।

झर जाना ही बसंत है, शस्य- श्रृंगार शरद है।

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