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रोजाना एक कविता : आज पढ़ें सपना भट्ट की कविता दस्तक

A poem a day

यह जानते हुए भी
कि हर बन्धन एक बाधा है
मैं तुम तक आई।

मैं तुम तक आई
मर्यादा की लंबी दूरी तय करके
छिलते कंधों , छूटती चप्पलों के साथ।
मुझसे नही छूटी, उम्मीद के छोर सी
कोई ट्रेन , कोई बस तुम्हारे शहर की कभी…

मैं तुम तक आई
नदियों पुलों चुंगियों और सस्ते ढाबों से गुज़र कर
मेरी चाय में तुम्हारे क़रीब पहुंचने की सुवास
इलायची की तरह शामिल रही।

मैं आई छुट्टियों में , कामकाजी दिनों में
त्योहारों से ऐन पहले या ज़रा बाद में
तुम्हारी राह देखी ,तुम्हारे ही चौखट के बंदनवार
और रंगोली की तरह
तुम्हारे सुख की कामना की मिठास
बताशों की तरह घुलती रही मेरे मन में।

मैंने नहीं देखी
कोई व्यस्तता , कोई परेशानी
घटता बीपी , बढ़ता यूरिक एसिड ।

मेरी दवाइयों की थैली में
तुम्हारे चेहरे की आभा लिए
हँसता रहा वसन्त
पीली लाल गोलियों की शक़्ल में।

सबका इस जहान में
किसी न किसी मंतव्य से आना तय है
मैं इस जग में आई
कि किसी रोज़ अपने द्वार पर
एक आकुल दस्तक पाकर
तुम अपनी ऐनक उतार, मुझे देखो
और कहो , आ गयी तुम !
कब से राह देख रहा था तुम्हारी
देखो ! अब जाना मत ….

सपना

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