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रोजाना एक कविता: आज पढ़िए पराग मांदले की कविता ‘एक स्त्री का प्रेम’

@पराग मांदले

क्या एक स्त्री के लिए
प्रेम करना भी
जन्म देने की प्रक्रिया से
गुजरना होता है?
मन की कोख में
बेखुदी के किन चरम क्षणों में
तुम्हें कर लिया था धारण
मैंने?
बारी-बारी से
उम्मीद और आशंकाओं की
उत्ताल तरंगे
मेरे सारे अस्तित्व को
आंदोलित किए रहती हैं।
हर दिन
तिल-तिल बढ़कर
मेरे होने पर
हावी हो रहा है तुम्हारा होना।
सुनो,
डॉक्टर कहते हैं
किसी एक को ही बचा पाएंगे हम!
मैं
तुम्हें जनकर
तुम्हें बचाना चाहती हूँ।

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