
महान संत कबीर ने कहा कि जब घर में धन और नाव में पानी आने लगे, तो उसे दोनों हाथों से निकालें. ऐसा करने में बुद्धिमानी है. हमें धन की अधिकता सुखी नहीं बनाती। इसलिए हमें पाने से पहले देना सीखना होगा।
स्वामी रामतीर्थके जीवन की एक घटना है। भ्रमण एवं भाषणों से परिश्रान्त स्वामीजी अपने निवास स्थान पर लौटे। उन दिनों वे एक महिला के यहां ठहरे थे। वे अपने ही हाथों भोजन बनाते थे। अपने स्वभाव के अनुसार वे भोजन करने की तैयारी कर ही रहे थे कि कुछ बच्चे पास में आकर खड़े हो गये। उनके पास बहुत बच्चे आया करते थे।
बच्चे भूखे थे। स्वामीजी ने अपनी सारी रोटियां एक-एक करके बच्चों में बांट दी। महिला वहीं बैठी सब देख रही थी। बड़ा आश्चर्य हुआ उसे, आखिर पूछ ही बैठी, ‘आपने सारी रोटियां तो उन बच्चों को दे डालीं, अब आप क्या खायेंगे?’ स्वामीजी के अधरों पर मुस्कान दौड़ गयी। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा, ‘माता! रोटी तो पेट की ज्वाला शान्त करने वाली वस्तु है। यदि इस पेट में न सही, तो उस पेट में सही।’ देने का आनन्द पाने के आनन्द से बड़ा है।


