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देहरी पर

देहरी पर
मन्दिर तुम्हारा है
देवता हैं किस के?

प्रणति तुम्हारी है
फूल झरे किस के?

नहीं, नहीं, मैं झरा, मैं झुका,
मैं ही तो मन्दिर हूँ,
ओ देवता! तुम्हारा।

वहां, भीतर, पीठिका पर टिके
प्रसाद से भरे तुम्हारे हाथ
और मैं यहां देहरी के बाहर ही
सारा रीत गया।

अज्ञेय

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