
स्वामी दयानन्द ने फर्रुखाबाद में गंगा के किनारे एक झोपड़ी में अपना डेरा डाला था। कैलास नामक एक युवक की उन पर बड़ी श्रद्धा थी। एक दिन वह उनके पास आया और उसने अन्दर आने की अनुमति मांगी।
दयानन्द हंसते हुए बोले, “यदि कैलास इस छोटे से झोंपड़े में प्रवेश कर सकता है, तो उसे अवश्य आना चाहिए।”
अन्दर आते ही वह बोला, “स्वामीजी! आज में आपके पास किसी खास उद्देश्य से आया हूं। बात यह है कि मेरे मन में रह-रहकर यह विचार उठता है कि इतनी साधना करने के बाद जब आप मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी हो गए हैं, तब फिर आप इस संसार की चिन्ता क्यों करते हैं?”
प्रश्न सुनकर स्वामीजी मुस्करा दिये, बोले, “कैलास! यह भी कोई प्रश्न है? जब मुझे साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि संसार में जहां-तहां अशान्ति है, यह अश्रु-सागर में डूब रहा है, दुःखों की अग्नि में झुलस रहा है, अत्याचारों से त्रस्त है, तब भला ऐसी स्थिति में उसे नजरअन्दाज कैसे कर सकता हूं? मैं मोक्ष प्राप्ति का इच्छुक नहीं हूं, न ही शान्तिपूर्वक मुक्ति चाहता हूं। मैं मुक्त होऊंगा, तो सबको साथ लेकर, अन्यथा मुझे मुक्ति नहीं चाहिए। कैलास! इसे अच्छी तरह समझ लो कि जो सच्चे हृदय से जनार्दन से प्यार करना चाहता है, उसे चाहिए कि वह जनता से, जो कि जनार्दन की ही कृति है, पहले प्यार करे, तभी जनार्दन का प्यार उसे मिलेगा।”


