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स्मृति शेष : तुम शब्दहीन कर गई अपराजिता…

अमित बृज

हम शब्द लिखते और तुम रंग भरती। हम तितली लिखते, तुम अपनी गोल-मटोल आँखों को इधर-उधर घुमाती। पहाड़ बनाती, झरना बनाती और पानी से अठखेलियां खेलती तितली। हम आंखें फाड़े देखते रहते.. अपराजिता शर्मा। अपराजिता नाम के साथ कितनी चीज़ें कौंध जाती हैं आँख के सामने। अद्भुत वाचन शैली से संतुलित विरोध जताती कलाकार…जितना सेंस ऑफ ह्यूमर, उतनी ही सेंसिटिविटी। जीवन में रंग और उल्लास घोलने वाली कलाकार। इन सबसे अद्भुत था तुम्हारा जोड़ने और जुड़ने वाला व्यक्तित्व।

इधर कुछ सालों से लगभग हर हिंदी वाले को जीवन में थी तुम । थोड़ी दूर से, अप्रत्यक्ष रूप से। तुमने कितना आसान कर दिया था सब। हिंदी में ‘हिमोजी’ नाम से इमोजी की एक नई भाषा विकसित करने वाली तुम हमारी पीढ़ी के बीच एक बड़ी रिक्ति छोड़ गई।

जानती हो, तुम्हारे चैट स्टिकर के सहारे हिंदी में धत्त तेरी की, कहब तो लग जाई धक्क से, हम हक से मांगें, धन्यवाद, हम्म, वाह-वाह… सब कुछ आसान हुआ है कहना। कलाकारों को छोड़, बहुत कम लोग जानते हैं कि तुमने हिंदी का पहला इमोजी सेट डेवलप किया। अलबेली और ललमुनिया का अविस्मरणीय किरदार भी तुमने ही रचा। वैसे भी जब तुमने 2016 में हिंदी में चैट स्टिकर बनाने शुरू किए थे और जिसे हिमोजी नाम दिया गया, तब तुम भी कहाँ जानती थी कि एक दिन यही अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम बन जाएगा।


लेकिन जानती हो, इन सबसे इतर सभी की तरह मुझे भी सबसे दिलचस्प लगा था अलबेली नाम का एक कैरेक्टर। उस करेक्टर के जरिए क्या कुछ नहीं कहा तुमने। एक स्त्री के मन की उथल-पुथल, गुस्सा, खुशी, दुख, गम, खीझ, अवसाद, ठहाके वाली हंसी, झुंझलाहट, उत्सव सब कुछ अलबेली के जरिए उकेरती। तुमने अलबेली के जरिए सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की मनाही पर कटाक्ष कर धर्म के ठेकेदारों को आइना दिखाया। महिलाओं को लेकर उटपटांग बयान हो या फिर किसान आंदोलन..सभी पर अलबेली अपनी प्रतिक्रिया देती है। तुम वो थी जिनसे रोज रोज बात नहीं होती लेकिन हमेशा बतियाते हुए से लगते।

लेकिन अब शोक की बेला है…मौन की बेला है…

बतौर कलमकार, तुम्हें अलविदा नहीं कहूंगा, तुम अपने रंगों, शब्दों से रहोगी जिंदा… तुम्हारी ‘अलबेली’ ज़िंदा रहेगी। हम शब्द लिखते जाएंगे और संभव है उसमें रंग भरने वाले भी मिल जाए लेकिन जो संभव नहीं है वो है तुम जैसा रंग भर पाना। तुम सचमुच अलबेली थी। तुम शब्दहीन करके गई। बस ये चित्र रह गये तुम्हारा स्पंदन लिए।

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