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टीचर्स डे पर 5 बेहतरीन कविताएं : क्या आप जानते हैं कि पशु-पक्षी भी आपको बहुत कुछ सिखाते हैं ?

शिक्षक यानी अध्यापक, शिक्षा देने वाला या गुरु। वो कोई भी हो सकता है। जिन्होंने पैदा किया, जिन्होंने मार्गदर्शन दिया और वो भी जिन्हें महज देखकर जीवन के इस महासंग्राम में सब कुछ झोंक देने की हिम्मत आती है। यानी हमारी प्रकृति और पशु पक्षी जो हमेशा प्रेरणा देते हैं, मन में स्फूर्ति और ताजगी भर देते हैं। इन्हीं पशु पक्षियों पर मनस्वी कवियों की बेहतरीन ओजस्वी कविताएं मनुष्य के मन को झकझोर कर जगाते रहती हैं। आज शिक्षक दिवस पर इंडिया ग्राउंड रिपोर्ट पांच ऐसी कविताएं आपके लिए पेश कर रहा है जिन्हें पढ़कर आपको जीवन पथ में मुश्किल के पलों में असीम साहस मिल सकेगा।

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्ही चीटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों मे साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिन्धु मे गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो

जब तक ना सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़कर मत भागो तुम
कुछ किए बिना ही जय जयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती.

उड़ चल, हारिल, लिये हाथ में यही अकेला ओछा तिनका।
ऊषा जाग उठी प्राची में-कैसी बाट, भरोसा किन का!
शक्ति रहे तेरे हाथों में-छुट न जाय यह चाह सृजन की;
शक्ति रहे तेरे हाथों में-रुक न जाय यह गति जीवन की!

ऊपर-ऊपर-ऊपर-ऊपर-बढ़ा चीरता जल दिड्मंडल
अनथक पंखों की चोटों से नभ में एक मचा दे हलचल!
तिनका? तेरे हाथों में है अमर एक रचना का साधन-
तिनका? तेरे पंजे में है विधना के प्राणों का स्पन्दन!

काँप न, यद्यपि दसों दिशा में तुझे शून्य नभ घेर रहा है,
रुक न, यदपि उपहास जगत् का तुझ को पथ से हेर रहा है;
तू मिट्टी था, किन्तु आज मिट्टी को तूने बाँध लिया है,
तू था सृष्टि, किन्तु स्रष्टा का गुर तूने पहचान लिया है!

मिट्टी निश्चय है यथार्थ, पर क्या जीवन केवल मिट्टी है?
तू मिट्टी, पर मिट्टी से उठने की इच्छा किस ने दी है?
आज उसी ऊध्र्वंग ज्वाल का तू है दुर्निवार हरकारा
दृढ़ ध्वज-दंड बना यह तिनका सूने पथ का एक सहारा।

मिट्टी से जो छीन लिया है वह तज देना धर्म नहीं है;
जीवन-साधन की अवहेला कर्मवीर का कर्म नहीं है!
तिनका पथ की धूल, स्वयं तू है अनन्त की पावन धूली-
किन्तु आज तू ने नभ-पथ में क्षण में बद्ध अमरता छू ली!

ऊषा जाग उठी प्राची में-आवाहन यह नूतन दिन का
उड़ चल हारिल, लिये हाथ में एक अकेला पावन तिनका!

यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।

स्‍मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खंडहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्‍व की संपत्ति चाहूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।

क्‍या हार में क्‍या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।
वरदान माँगूँगा नहीं।।

लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्‍यर्थ त्‍यागूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।

चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्‍य पथ से किंतु भागूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।

निर्बल बकरों से बाघ लड़े
भिड़ गये सिंह मृग-छौनों से
घोड़े गिर पड़े गिरे हाथी
पैदल बिछ गये बिछौनों से

हाथी से हाथी जूझ पड़े
भिड़ गये सवार सवारों से
घोड़ों पर घोड़े टूट पड़े
तलवार लड़ी तलवारों से

हय-रूण्ड गिरे¸गज-मुण्ड गिरे
कट-कट अवनी पर शुण्ड गिरे
लड़ते-लड़ते अरि झुण्ड गिरे
भू पर हय विकल बितुण्ड गिरे

क्षण महाप्रलय की बिजली सी
तलवार हाथ की तड़प–तड़प
हय–गज–रथ–पैदल भगा भगा
लेती थी बैरी वीर हड़प

क्षण पेट फट गया घोड़े का
हो गया पतन कर कोड़े का
भू पर सातंक सवार गिरा
क्षण पता न था हय–जोड़े का

चिंग्घाड़ भगा भय से हाथी
लेकर अंकुश पिलवान गिरा
झटका लग गया,फटी झालर
हौदा गिर गया¸निशान गिरा

कोई नत–मुख बेजान गिरा
करवट कोई उत्तान गिरा
रण–बीच अमित भीषणता से
लड़ते–लड़ते बलवान गिरा

मेवाड़–केसरी देख रहा
केवल रण का न तमाशा था
वह दौड़–दौड़ करता था रण
वह मान–रक्त का प्यासा था

चढ़कर चेतक पर घूम–घूम
करता सेना–रखवाली था
ले महा मृत्यु को साथ–साथ
मानो प्रत्यक्ष कपाली था

रण–बीच चौकड़ी भर–भरकर
चेतक बन गया निराला था
राणा प्रताप के घोड़े से
पड़ गया हवा को पाला था

गिरता न कभी चेतक–तन पर
राणा प्रताप का कोड़ा था
वह दोड़ रहा अरि–मस्तक पर
या आसमान पर घोड़ा था

जो तनिक हवा से बाग हिली
लेकर सवार उड़ जाता था
राणा की पुतली फिरी नहीं
तब तक चेतक मुड़ जाता था

सेना–नायक राणा के भी
रण देख–देखकर चाह भरे
मेवाड़–सिपाही लड़ते थे
दूने–तिगुने उत्साह भरे

क्षण मार दिया कर कोड़े से
रण किया उतर कर घोड़े से।
राणा रण–कौशल दिखा दिया
चढ़ गया उतर कर घोड़े से

क्षण भीषण हलचल मचा–मचा
राणा–कर की तलवार बढ़ी
था शोर रक्त पीने को यह
रण–चण्डी जीभ पसार बढ़ी

वह हाथी–दल पर टूट पड़ा
मानो उस पर पवि छूट पड़ा
कट गई वेग से भू ऐसा
शोणित का नाला फूट पड़ा

ऐसा रण राणा करता था
पर उसको था संतोष नहीं
क्षण–क्षण आगे बढ़ता था वह
पर कम होता था रोष नहीं

कहता था लड़ता मान कहां
मैं कर लूं रक्त–स्नान कहां
जिस पर तय विजय हमारी है
वह मुगलों का अभिमान कहां

भाला कहता था मान कहां¸
घोड़ा कहता था मान कहां?
राणा की लोहित आंखों से
रव निकल रहा था मान कहां

मैंने चिड़िया से कहा, ‘मैं तुम पर एक
कविता लिखना चाहता हूं।’
चिड़िया ने मुझसे पूछा, ‘ तुम्हारे शब्दों में
मेरे परों की रंगीनी है?’
मैंने कहा, ‘नहीं।’
‘तुम्हारे शब्दों में मेरे कंठ का संगीत है ?’
‘नहीं।’
‘तुम्हारे शब्दों में मेरे डैनों की उड़ान है? ‘
‘नहीं।’
‘जान है?’
‘नहीं।’
‘तब तुम मुझ पर कविता क्या लिखोगे ?’
मैंने कहा, ‘पर तुमसे मुझे प्यार है।’
चिड़िया बोली, ‘प्यार का शब्दों से क्या सरोकार है?’
एक अनुभव हुआ नया ।
मैं मौन हो गया !

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